India को SAF में Global Leader बनने का मौका!

Dhritishmita Ray

SAF: Aviation decarbonisation का बड़ा हथियार

Sustainable aviation fuel (SAF) को आज ग्लोबल एविएशन इंडस्ट्री के डिकार्बोनाइजेशन में सबसे अहम भूमिका निभाने वाला माना जा रहा है। International Air Transport Association (IATA) में Net Zero Transition Programs की हेड, Preeti Jain का मानना है कि SAF अकेले 60% तक कार्बन उत्सर्जन में कटौती में योगदान कर सकता है। हालांकि, अभी SAF का ग्लोबल जेट फ्यूल प्रोडक्शन में हिस्सा केवल 0.7% है और 2030 तक कई SAF प्रोजेक्ट्स पूरे होने की संभावना कम दिख रही है।

भारत के लिए SAF में अवसर

भारत को SAF प्रोडक्शन के लिए फीडस्टॉक को प्रायोरिटी देनी होगी, मौजूदा रिफाइनिंग कैपेसिटी का लाभ उठाना होगा और रिसर्च तथा नई टेक्नोलॉजी में निवेश करना होगा। इसके साथ ही, फंडिंग और फीडस्टॉक सप्लाई चेन को मजबूत करना होगा ताकि समय रहते सस्टेनेबिलिटी सर्टिफिकेशन की सभी शर्तों को पूरा किया जा सके।

यूरोप बनाम US: SAF को लेकर अलग राहें

यूरोप ने SAF ब्लेंडिंग को लेकर अनिवार्यता लागू की है, लेकिन IATA का मानना है कि अभी SAF की सप्लाई चेन उस स्तर पर नहीं है, जिससे अनिवार्यता का पूरा लाभ उठाया जा सके। यूरोप में SAF की कीमतें भी ज्यादा हैं और ट्रांसपेरेंसी की कमी है, जिससे एयरलाइंस पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। दूसरी ओर, US ने इंसेंटिव्स और सब्सिडी के माध्यम से SAF प्रोडक्शन को बढ़ावा दिया। वहां प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव्स, फीडस्टॉक सब्सिडी, टैक्स क्रेडिट्स और ग्रीन हाइड्रोजन प्रोडक्शन के लिए भी इंसेंटिव्स दिए गए हैं, जिससे SAF सप्लाई चेन मजबूत हुई है।

ग्लोबल लेवल पर SAF के लिए क्या जरूरी?

दुनियाभर में बायोरिफाइनरी कैपेसिटी मौजूद है, लेकिन सही इंसेंटिव्स के बिना SAF प्रोडक्शन में तेजी लाना मुश्किल होगा। गवर्नमेंट्स को प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव्स, टैक्स बेनेफिट्स और ऑफटेक फैसिलिटीज पर ध्यान देना चाहिए, जैसे सोलर और विंड सेक्टर में किया गया। इस तरह के कदम SAF इकोसिस्टम को मजबूती देंगे और एयरलाइंस की SAF डिमांड को पूरा करने में मदद करेंगे।